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श्री दयानन्द जी गुप्त का संक्षिप्त जीवन परिचय


परम श्रद्धेय स्वनामधन्य श्री दयानन्द जी गुप्त का जन्म प्रबुद्ध आर्यसमाजी डा. रामस्वरूप जी के यहाॅ राजा की हाट झाॅसी में 12 दिसम्बर 1912 को हुआ था। अपने 5 भाईयों तथा एक बहन में से सबसे छोटे होने के साथ उनके माता-पिता ने ऋषि दयानन्द को अपने आदर सुमन अर्पित करते हुए उनका नाम दयानन्द रखा। अपनी माता जी श्रीमती रामप्यारी की निष्छलता तथा सरलता को आपने विरासत में पाया ।


अपनी किषोरावस्था में आपने महात्मा गाॅधी के आह्मन पर देष पर मर मिटने वाली पीढ़ी का जयघोष सुना और फलस्वरूप सन् 1929 में राजकीय इन्टर कालिज, हरदोई से हाईस्कूल पास करने के उपरान्त 1930 के आन्दोलन में भाग लेना शुरू कर दिया ।

अध्ययन तथा विद्यार्थी जीवन भी चलता रहा और सन् 1931 में एस.एम. काॅलेज चन्दोैसी से इन्टर मीडियेट की परीक्षा उत्र्तीण की । प्रयाग विष्वविद्यालय में प्रवेष के लिये आप जीवन भर अपने गुरूजनों के ऋणि रहे,जिन्होने अपने अथक प्रयत्न से अपको प्रयाग विष्वविद्यालय में प्रवेष दिलवाया। क्योंकि गौरांग प्रभुओं के शासन के विरुद्ध कान्तिकारी भूमिका में सक्रिय भाग लेने वाले विद्यार्थियों को उस समय देषद्र्रोही की संज्ञा दी जाती थी और श्री दयानन्द जी भी उसी श्रेर्णी के विद्यार्थी थें । सन् 1933 में बी.ए. की स्नातक परीक्षा उत्र्तीण करने के पश्चात आपने लखनऊ विष्वविद्यालय से एल.एल.बी. की परीक्षा उत्र्तीण की। सन 1936 में मुरादाबाद नगर में अधिवक्ता के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ करके इस कार्य क्षेत्र को नये आयाम दिये ।

भावुक तथा निष्छल व्यक्ति साहित्यानुरागी होता है । लखनऊ तथा प्रयाग विष्वविद्यालय के प्रवास काल में वे हिन्दी साहित्य के यषस्वी कवि श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के सम्पर्क में आये अैेर यह सम्पर्क घनिष्ठता में परिवर्तित होता हुआ मैत्री में बदल गया । इस मैत्री से आपकी सृजनषीलता को नया संबल मिला और अन्ततः आपकी रचनायें-कारवां, मंजिल कहानी संग्रह तथा नेैवेद्य काव्य संग्रह एवं एक राजनैतिक तथा सामाजिक पृष्ठ भूमि पर आधारित नाटक यात्रा का अन्त कहाॅ सन् 1943-46 में स्थानीय अरूण प्रेस द्वारा प्रकाषित हुई। श्री निराला जी ने अपनी रचना कारवा की भूमिका भी सहर्ष लिखी थी। सन् 1941 में आपने मुरादाबाद में हिन्दी परिषद की स्थापना की।

सन् 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के तुमुल घोष से जब भारत का गगन गंूज रहा था तब आप भी अछूते न रह सके और वफादार क्र्रियाषील सदस्य की तरह श्री प्रभू दास गाॅधी के नेतृत्व में स्थानीय आन्दोलन में भाग लिया। सन् 1945 में मजदूर आन्दोलन में भाग लिया- अनेक श्रमिक संगठनों एवं लेबर यूनियनों का स्वर्गीय डा. भूप स्वरूप सक्सैना जैसे मित्रों के साथ आपने कुषल नेतृत्व किया । उत्तर प्रदेष इन्टक की कार्यकारिणी के सदस्य और पदाधिकारी रहे। सन् 1951 में जिनेवा में हुये अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि नेता के रूप में भाग लिया ।

सन् 1951 में ही आपने पत्रकारिता में प्रवेष किया और अभ्युदय नाम की साप्ताहिक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाषन किया ।

अपने चिन्तन को क्रियान्वित करने की आप में अपूर्व क्षमता थी। यदि उन्हें मनीषी सृष्टा की संज्ञा दें तो अतिषयोक्ति न होगी । विदेष में श्रमिक बच्चों के लिये षिक्षा व्यवस्था को देखकर आप बहुत प्रभावित हुये। आपके हृदय में ज्ञान दान का विचार स्फुटित हुआ। सन् 1952 में विदेष से लौटने पर मुरादाबाद में वर्षो से बन्द चली आ रही संस्था बल्देव आर्य संस्कृत पााठषाला को पुनः प्रारम्भ किया जिसमें संस्कृत के निःषुल्क षिक्षा की व्यवस्था आज भी है । उसी वर्ष बल्देव आर्य कन्या विद्यालया तदोपरान्त बल्देव आर्य कन्या इण्टर कालिज तथा सन् 1960 में दयानन्द आर्य कन्या डिग्री कालिज मुरादाबाद की स्थापना । अपने पितृऋण से उऋण होने के लिये पैतृक ग्राम सैद नगली जिला मुरादाबाद में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की भी स्थापना की ।

कांग्रेसी विचार धारा उनमें इतनी अधिक रचीवसी थी कि अन्त तक वे खादी के ही वस्त्रों का उपयोग करते रहे । कांग्रेस विभाजन के समय सन् 1969 में आपने प्रगतिषील विचाारों की पोषक एवं नेता श्रीमती इन्दिरा गांधी का समर्थन किया तब से बराबर सुख एवं संकट में वे उनके साथ रहे । 1972 से 1980 तक मुरादाबाद नगर की कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर रहते हुये संगठन का नेतृत्व किया। अपने व्यसायिक तथा सामाजिक जीवन में अत्यन्त व्यस्त रहते हुये भी पठन और अध्यन का क्रम अन्त तक बना रहा। 1977 में अग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने के पश्चात जीवन के अन्तिम दो वर्षो में आप अग्रेजी साहित्य के भूले बिसरे कवि और लेखक एडविन म्यूर पर शोध कार्य में संलग्न थे ।

जो व्यक्ति समाज से लेता है परन्तु समाज को कुछ देता नहीं वह समाज का तस्कर है । यह सूत्र उनके सामाजिक कार्यक्षेत्र का केन्द्र बिन्दू बना रहा । उनके द्वारा समाज की विभिन्न रूपिणी सेवाओ से कौन लाभान्वित नहीं हुआ। विभिन्न विषयों पर आपकी मौलिक चिन्तर शीलता और दूरदरषिता से सभी अवगत हैं । देष के आप वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होने देष में बढ़ती हुई आवादी के असन्तुलन की ज्वलंत समस्या की नई विवेचना प्रस्तुत की । विचारको को नया दर्षन दिया । यदि देष में मुस्लिम जनसंख्या की इसी अनुपात में वृद्धि होती रही तो कुछ ही दषको में हिन्दु अल्पसंख्यक हो जायेगा फिर देष का धर्मनिरपेक्ष रूप सुरक्षित नहीं रह सकेगा और अन्ततः समाप्त हो जावेगा। सन् 1980 में जब मुरादाबाद कथित सामप्रदायिक दंगे की आग में झुलस रहा था आपने निष्चय उद्देष्य से भारतीय नागरिक परिषद की स्थापना की और मुरादाबाद के एक वृद्ध प्रतिनिधि मण्डल के निर्भीक नेता के रूप में देष के सामने इस गहराते संकट से प्रधान मंत्री गाॅधी को अवगत कराया। साथ ही देष के अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं, राष्ट्रीय नेताओं को देष को इस संकट से उबारने के लिये आवाहन किया । महाऋषियों की भाॅति उनकी तात्विक दृष्टि ने देखा की हिन्दुओं को अपनी रूढ़िवादिता को दूर करके जातिगत भेदभाव भुलाकर संगठित करने की आवष्यकता है । हिन्दू जाति को संगठित करने के लिये उनकी स्थिति को सुदृढ़ और हिन्दुत्व के वर्चस्व को पुर्नस्थापित करने के लिये उन्होने सामुहिक पूजा पद्धति का सूत्रपात किया । हिन्दु धर्म के सभी अनुयाईयों को ओंम के झंडे के नीचे एकत्रित करने का प्रयास किया ।

आपकी ओजस्विता एवं निर्भीक नवदृष्टि के फलस्वरूप मुरादाबाद में 7 जुलाई 1981 को विषाल हिन्दु धर्म सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें उपस्थित जनता ने श्री गुप्ता जी के विचारो में अपनी आस्था प्रकट की और उनके नेतृत्व में कार्य करने का संकल्प लिया । देष के अन्य हितैषियों का हिन्दुत्व की रक्षा के लिये उन्होने मार्ग दर्षन किया।

श्री गुप्त जी सच्चे कर्मयोगी थे उन्होने जीवन पर्यनत प्रत्येक छढ़ का सदुपयोग किया । नित्यप्रति व्यायाम उनकी दिनचर्या का अंग था। दृढ़ संकल्प शक्ति और कर्म शक्ति के कारण ही 69 वर्ष की आयु में भी उनमें युवको जैसी स्फूर्ति थी । मुरादाबाद जनपद के वाग्मयी अधिवक्ता के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक थी । तो प्रबुद्ध जगत में उनकी विद्वतता एवं प्रगतिषील विचारों की धाक थी। षिक्षण संस्थाओं के सुधारक उदारमना व्यवस्थापक के रूप में वे प्रसिद्ध थे। सतत अध्यता के रूप में उन्होने जहाॅ हिन्दी अंग्रेजी साहित्य का पारायण किया वहाॅ भारत की प्राचीन सभ्यता संस्कृति को समझने के लिये इतिहास और वेद का भी अध्ययन किया । आपने हिन्दू धर्म ग्रन्धों के साथ विषलेषक की भाॅति पूरे मनो योग से कुरान को भी पढ़ा । संघर्षो से जूझते रहना, चुनौतियों को स्वीकार कर उनपर विजय पाना निरन्तर कार्य करते रहना उनकी प्रकृति में था।

25 मार्च का दिन जीवन के और दिनो की भाॅति उनके लिये कर्मदिवस था। मध्यान्ह तक अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करते रहे और 25 मार्च 1982 को अपरान्ह संसार से महाप्रयाण कर गये ।